नाट्यशास्त्र में मूल रखने वाली आठ शास्त्रीय नृत्य-परम्पराएँ — और हर ऋतु, फ़सल और
उत्सव के साथ थिरकते अनगिनत लोकनृत्य। यह पृष्ठ दोनों धाराओं का परिचय देता है: उनका
इतिहास, तकनीक, महत्त्व और उन्हें गढ़ने वाले लोग।
भरतनाट्यम तमिलनाडु की मंदिर-नृत्य परम्परा से उतरा है, जिसे शताब्दियों तक
देवदासियाँ (मंदिर-सेवा को समर्पित स्त्रियाँ) करती थीं; तब इसे सदिर
कहा जाता था। 19वीं शताब्दी में तंजावुर दरबार के चार संगीतकार भाइयों — "तंजावुर
चौकड़ी" — ने आज भी प्रचलित कच्चेरी-क्रम को व्यवस्थित किया। औपनिवेशिक काल के कलंक और
समर्पण-विरोधी क़ानूनों से यह कला लगभग लुप्त हो चली थी; ई. कृष्ण अय्यर और रुक्मिणी
देवी अरुंडेल (कलाक्षेत्र, चेन्नई की संस्थापिका, 1936) जैसे सुधारकों ने 20वीं शताब्दी
में इसे आधुनिक नाम से पुनर्जीवित और पुनर्मंचित किया।
विवरण एवं तकनीक
आधार है मुड़े घुटनों की अरैमंडी मुद्रा, ज्यामितीय रेखाएँ, अडवु
कहलाने वाली तालबद्ध पद-इकाइयाँ और समृद्ध मुद्रा-शब्दावली। पारम्परिक प्रस्तुति
(मार्गम्) अलारिप्पु, जतिस्वरम्, वर्णम् (केन्द्रीय
रचना) और तिल्लाना जैसी कड़ियों से गुज़रती है — कर्नाटक गायन, मृदंगम् और
नट्टुवांगम् की संगत में।
महत्त्व
विद्वानों के सामान्य वर्णन के अनुसार भारत की प्राचीनतम व्यवस्थित शास्त्रीय
नृत्य-परम्पराओं में से एक, और आज हर महाद्वीप पर सिखाई जाने वाली भारतीय संस्कृति की
वैश्विक दूत।
विभूतियाँ: रुक्मिणी देवी अरुंडेल (पुनरुद्धारक,
कलाक्षेत्र), टी. बालासरस्वती (देवदासी-परम्परा की महान साधिका), यामिनी कृष्णमूर्ति,
पद्मा सुब्रह्मण्यम (नर्तकी-विदुषी), अलार्मेल वल्ली, मालविका सारुक्कई।
कथक का नाम कथाकारों से आया — वे घुमक्कड़ कथावाचक जो मुद्रा और गीत से
महाकाव्य और कृष्ण-कथाएँ सुनाते थे। मुग़ल काल में यह राजदरबारों में पहुँचा और फ़ारसी
प्रभाव का परिष्कार, विलक्षण पदकार्य और चक्कर आत्मसात किए। तीन प्रमुख घराने
विकसित हुए: लखनऊ (भावपूर्ण लालित्य), जयपुर (लयकारी की शक्ति) और बनारस।
विवरण एवं तकनीक
पहचान-चिह्न हैं तत्कार (घुँघरुओं में गूँजता द्रुत पदकार्य — घुँघरुओं की
संख्या प्रशिक्षण-स्तर और परम्परा से बदलती है), बिजली-से चक्कर, तबले से
लयकारी का संवाद, और गत-भाव की कथावाचन शैली। यह हिन्दुस्तानी संगीत से गहरे
जुड़ा है — तीनताल और अन्य तालों पर नाचा जाता है।
महत्त्व
हिन्दू और भारत-फ़ारसी दरबारी संस्कृतियों का अनोखा सेतु; इसकी लयकारी ने भारतीय
सिनेमा की नृत्य-रचना को गहराई से प्रभावित किया।
विभूतियाँ: पंडित बिरजू महाराज (लखनऊ घराने के
शिखर-पुरुष), सितारा देवी, शम्भु महाराज, कुमुदिनी लाखिया (नवाचारी नृत्य-रचनाकार),
रोशन कुमारी।
कथकली केरल
दक्षिण भारत — केरलनृत्य-नाट्यविस्तृत रूपसज्जा व वेशभूषा
पूर्ण वेषम् में कथकली कलाकार — वेशभूषा, मुकुट और चित्रित मुख।
चित्र: Lensmatter · विकिमीडिया कॉमन्स
इतिहास
कथकली ("कथा-क्रीड़ा") ने लगभग 17वीं शताब्दी में केरल में आकार लिया —
रामनाट्टम और कृष्णनाट्टम जैसी पूर्ववर्ती मंदिर व युद्धकला
परम्पराओं से विकसित होकर; इसकी गति-शब्दावली पर युद्धकला कलरीपयट्टु का
प्रभाव है। कवि वल्लत्तोल नारायण मेनन ने केरल कलामंडलम (1930) की स्थापना की — वह
संस्था जिसने इसके आधुनिक पुनरुद्धार को आधार दिया।
विवरण एवं तकनीक
महाकाव्य-प्रसंगों की रात-भर चलने वाली प्रस्तुतियाँ, परम्परा से पुरुष मंडलियों
द्वारा। पात्र विस्तृत चित्रित रूपसज्जा-प्रकारों से पहचाने जाते हैं — पच्चा
(हरा, कुलीन नायक), कत्ति (प्रति-नायक), ताड़ी (दाढ़ीधारी),
करि और मिनुक्कु — ऊँचे मुकुट और लहराते घेर के साथ। अभिनेता पूरी
तरह मुद्राओं और असाधारण रूप से साधे गए नेत्र-मुख स्नायुओं से "बोलते" हैं — चेंडा और
मद्दलम की संगत में गाई जाती कथावाचना पर।
महत्त्व
दृश्य-वैभव में संसार की सर्वाधिक चमत्कारिक रंग-परम्पराओं में से एक, और केरल की
संस्कृति का परिभाषक प्रतीक।
विभूतियाँ: वल्लत्तोल नारायण मेनन (पुनरुद्धारक),
कलामंडलम कृष्णन नायर, कलामंडलम गोपी, कोट्टक्कल शिवरामन (स्त्री-भूमिकाओं के लिए
प्रसिद्ध)।
कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश
दक्षिण भारत — आंध्र प्रदेशनृत्य-नाट्य मूलकर्नाटक संगीत
नाम आंध्र प्रदेश के कृष्णा ज़िले के कुचिपुड़ी गाँव से, जहाँ ब्राह्मण मंडलियाँ
भक्ति नृत्य-नाटिकाएँ मंचित करती थीं। परम्परा 16वीं–17वीं शताब्दी के संत-कवि
सिद्धेन्द्र योगी को इस रूप और इसकी विशिष्ट नाटिका भामा कलापम् को गढ़ने का
श्रेय देती है। 20वीं शताब्दी में वेदान्तम लक्ष्मीनारायण शास्त्री और वेम्पति चिन्ना
सत्यम जैसे गुरुओं ने इसे एकल मंच-कला के रूप में भी निखारा।
विवरण एवं तकनीक
द्रुत, उछाल-भरे पदकार्य के साथ तरल लालित्य और सशक्त नाट्य-चरित्रण; नर्तक परम्परा
से पात्रों के रूप में बोलते या गाते भी हैं। सबसे प्रसिद्ध चमत्कारिक रचना है
तरंगम् — पीतल की थाली के किनारे पर संतुलन साधकर, कभी-कभी सिर पर जलपात्र
रखकर, किया जाने वाला नृत्य।
महत्त्व
आधुनिक एकल कच्चेरी के साथ-साथ पुरानी नृत्य-नाट्य शैली को भी जीवित रखता है, और
तेलुगु-भाषी राज्यों की अग्रणी शास्त्रीय कला बना हुआ है।
विभूतियाँ: सिद्धेन्द्र योगी (पारम्परिक
प्रवर्तक), वेम्पति चिन्ना सत्यम (आधुनिक व्यवस्थापक), वेदान्तम सत्यनारायण शर्मा
(स्त्री-भूमिकाओं के महान विशेषज्ञ), राजा-राधा रेड्डी, यामिनी कृष्णमूर्ति।
ओडिशा की मंदिर-संस्कृति में निहित — पुरी के जगन्नाथ मंदिर की माहारियों
और स्त्री-वेश में नाचते बालकों की गोटिपुआ परम्परा में। कोणार्क और भुवनेश्वर
के मंदिर-शिल्पों में इसकी मुद्राएँ प्रतिध्वनित हैं, और उदयगिरि की गुफाएँ भारत के
प्राचीनतम प्रदर्शन-सम्बद्ध स्थलों में गिनी जाती हैं। 20वीं शताब्दी के मध्य तक लगभग
लुप्त यह कला 1950 के दशक में केलुचरण महापात्र, पंकज चरण दास और देब प्रसाद दास जैसे
गुरुओं द्वारा पुनर्निर्मित हुई।
विवरण एवं तकनीक
अपनी शिल्प-सदृशता के लिए विख्यात: त्रिभंग मुद्रा और भगवान जगन्नाथ से जुड़ी
चौकोर चौका स्थिति। प्रस्तुति प्रायः मंगलाचरण से पल्लवी
(राग को खिलाता शुद्ध नृत्य) होते हुए भावपूर्ण अभिनय तक जाती है — अक्सर
जयदेव के 12वीं शताब्दी के संस्कृत काव्य गीत गोविन्द पर।
महत्त्व
20वीं शताब्दी के पुनरुद्धार का आदर्श उदाहरण: मंदिर-शिल्प, ताड़पत्र पोथियों और
बचे हुए साधकों से पुनर्रचित होकर सबसे गीतिमय शास्त्रीय शैलियों में से एक।
विभूतियाँ: गुरु केलुचरण महापात्र, पंकज चरण
दास, देब प्रसाद दास, संयुक्ता पाणिग्रही, सोनल मानसिंह, माधवी मुद्गल।
मणिपुरी (रासलीला) मणिपुर
पूर्वोत्तर भारत — मणिपुरभक्तिमूलक — वैष्णवकोमल, वर्तुल गति
मणिपुरी नृत्य देशज अनुष्ठान-परम्परा लाई हराओबा से उपजा और 18वीं शताब्दी
में — जब वैष्णव धर्म मणिपुर का राजधर्म बना — अपनी शास्त्रीय रासलीला में खिला;
विशिष्ट रास-वेशभूषा की परिकल्पना का श्रेय राजा भाग्यचन्द्र को दिया जाता है। 20वीं
शताब्दी के आरम्भ में रवीन्द्रनाथ ठाकुर मणिपुरी गुरुओं को शान्तिनिकेतन ले आए, जिससे
यह शैली शेष भारत से परिचित हुई।
विवरण एवं तकनीक
कोमल, अखंड, वर्तुल गतियाँ — न झटके, न भारी पदकार्य — नर्तकी मानो तैरती है।
रास की नर्तकियाँ कड़े, समृद्ध कढ़ाई वाले बेलनाकार घाघरे (कुमिल) और झीने
आवरण में सजती हैं। पुरुषों का ढोल-नृत्य पुंग चोलोम — बजाते-बजाते कूदते,
घूमते वादक — प्रसिद्ध सह-परम्परा है; सम्बद्ध भक्ति गान-वादन रूप संकीर्तन
यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित है।
महत्त्व
पूर्व-वैष्णव मैतेई अनुष्ठान और कृष्ण-भक्ति का जीवित संगम, जिसे मणिपुर में मनोरंजन
नहीं, उपासना माना जाता है।
विभूतियाँ: गुरु बिपिन सिंह (व्यवस्थापक एवं
शिक्षक), झवेरी बहनें (दर्शना, नयना, रंजना, सुवर्णा), गुरु आमुबी सिंह।
मोहिनीअट्टम केरल
दक्षिण भारत — केरललास्य — स्त्रैण लालित्यश्वेत-स्वर्ण वेशभूषा
इतिहास
"मोहिनी का नृत्य" — पुराणों की दिव्य मोहिनी — केरल का स्त्रियों का शास्त्रीय एकल
नृत्य है। 19वीं शताब्दी में त्रावणकोर के स्वाति तिरुनल के दरबार में इसे उल्लेखनीय
संरक्षण मिला; औपनिवेशिक काल की नापसंदगी में यह क्षीण हुआ, और 20वीं शताब्दी में केरल
कलामंडलम के माध्यम से पुनर्जीवित हुआ — कलामंडलम कल्याणीकुट्टी अम्मा जैसी गुरुओं ने
इसका आधुनिक प्रदर्शन-क्रम गढ़ा।
विवरण एवं तकनीक
बल लास्य पर — केरल के नारियल-वनों और पश्चजल से उपमित लहराती, डोलती गति —
धड़ का कोमल आरोह-अवरोह, सूक्ष्म अभिनय, और पार्श्व-जूड़े के साथ प्रतिष्ठित
श्वेत-स्वर्ण कासवु वेशभूषा। संगीत कर्नाटक-आधारित है, रचनाएँ मलयालम और मणिप्रवालम
में।
महत्त्व
शास्त्रीय परम्परा के भीतर एक विशिष्ट स्त्रैण सौंदर्य-दृष्टि की वाहक, और केरल की
गीति-काव्य परम्परा को मंच पर जीवित रखने वाली कला।
पूर्वोत्तर भारत — असममठीय उद्भव2000 में शास्त्रीय मान्यता
इतिहास
15वीं–16वीं शताब्दी में असमिया संत-सुधारक श्रीमंत शंकरदेव द्वारा वैष्णव भक्ति के
वाहन रूप में रची गई, और पाँच शताब्दियों तक असम के सत्रों (मठों) — विशेषतः
माजुली द्वीप — में सुरक्षित रही। भिक्षु इसे दैनिक अनुष्ठान और अंकीया नाट
(एकांकी भक्ति नाटिकाओं) में करते थे। संगीत नाटक अकादमी ने 2000 में सत्रिया को
शास्त्रीय नृत्य की मान्यता दी — शास्त्रीय वर्ग में सबसे नया प्रवेश।
विवरण एवं तकनीक
ओजस्वी पौरुष और लालित्यमय स्त्रैण — दोनों शैलियाँ; संगत में बोरगीत
(शंकरदेव और शिष्य माधवदेव की भक्ति रचनाएँ), खोल मृदंग और झाँझ; वेशभूषा
असम के पाट रेशम की।
महत्त्व
दरबारों या मंदिरों के बजाय एक जीवित मठीय समुदाय द्वारा सहेजी गई शास्त्रीय कला का
विरल उदाहरण — अब स्त्री कलाकारों सहित मंच पर फल-फूल रही है।
विभूतियाँ: श्रीमंत शंकरदेव (प्रवर्तक), माधवदेव
(रचनाकार-उत्तराधिकारी), तथा गुरु जतिन गोस्वामी और इंदिरा पी. पी. बोरा जैसे आधुनिक
साधक।
लोक एवं सामुदायिक नृत्य
सैकड़ों में से एक चयन — भारत के हर ज़िले के अपने ऋतु, फ़सल,
अनुष्ठान और आनंद के नृत्य हैं।
भांगड़ा और गिद्धा पंजाब
पंजाबफ़सल — बैसाखी
पंजाब का उल्लासमय पुरुष-नृत्य भांगड़ा दो-मुँहे ढोल, उछलते कंधों और
बोलियों की ऊर्जा से चलता है; गिद्धा तालियों, विनोद और गीतों वाला स्त्रियों
का दमकता प्रतिरूप है। कभी बैसाखी की फ़सल से जुड़ा भांगड़ा पंजाबी प्रवासियों के साथ
वैश्विक विधा बन गया है — हिप-हॉप और इलेक्ट्रॉनिक संगीत से घुलता हुआ, जबकि गाँव और
कॉलेज की मंडलियाँ पारम्परिक शब्दावली जीवित रखे हैं।
नवरात्रि की नौ रातों में समुदाय देवी की ज्योति या प्रतिमा के चारों ओर संकेन्द्रित
वृत्तों में गरबा नाचते हैं — वृत्त काल-चक्र का प्रतीक, केन्द्र में अचल दिव्यता — और
काठ के डांडियों की खनक के साथ डांडिया रास, जिसमें कृष्ण के रास और देवी के खड्ग-खेल
की स्मृति है। 2023 में गरबा यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में अंकित हुआ,
और आज अहमदाबाद से न्यू जर्सी तक स्टेडियम भर देता है।
घूमर राजस्थान
राजस्थानस्त्रियों का वृत्त-नृत्य
राजस्थानी स्त्रियों का घुमावदार नृत्य — परम्परा से भील समुदाय से और आगे राजपूत
दरबारों से जुड़ा — पर्व-उत्सवों पर घेरदार घाघरों में, जिनका चक्करदार फैलाव
ही नाम का स्रोत है (घूमना से)। गीत विवाह, त्योहार और मरु-जीवन के; घूँघट में
नपे-तुले चक्कर इसे भारत के सर्वाधिक छायांकित लोकरूपों में रखते हैं।
थार के वंशानुगत सँपेरे कालबेलिया समुदाय का सर्पिल नृत्य। काली कढ़ाईदार घूमती
घाघरियों में स्त्रियाँ नाग की गतियों का दर्पण बनती हैं — पुंगी (बीन) की
मर्मस्पर्शी गूँज और ढोलक-खंजरी की थाप पर। यूनेस्को ने 2010 में
कालबेलिया गीत-नृत्य को अमूर्त धरोहर सूची में अंकित किया। गुलाबो सपेरा इसकी सबसे
प्रसिद्ध आधुनिक साधिका हैं।
लावणी महाराष्ट्र
महाराष्ट्रढोलकी-चालित
ढोलकी की थाप पर गीत-नृत्य का सशक्त संगम, ऐतिहासिक रूप से तमाशा लोकनाट्य
में मंचित। नौ गज़ की साड़ियों में स्त्रियों द्वारा प्रस्तुत लावणी भक्ति से लेकर
चतुर शृंगार तक फैली है — कभी थके सैनिकों का मनोरंजन, कभी पैना सामाजिक व्यंग्य।
इसकी लय-तीव्रता ने मराठी सिनेमा और रंगमंच को गहराई से प्रभावित किया है।
छऊ ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल
पूर्वी भारतरणकौशल नृत्य-नाट्ययूनेस्को धरोहर (2010)
तीन क्षेत्रीय शैलियों वाला अर्ध-शास्त्रीय रणकौशल नृत्य-नाट्य — मयूरभंज (ओडिशा,
बिना मुखौटों के), सरायकेला (झारखंड) और पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) — अंतिम दोनों अपने
नाटकीय मुखौटों के लिए प्रसिद्ध। छद्म-युद्ध, पशु-पक्षी चालों और महाकाव्य-प्रसंगों पर
आधारित छऊ वसंत के चैत्र पर्व में ढोल और मोहुरी पर नाचा जाता है। यूनेस्को ने 2010 में
छऊ को अमूर्त धरोहर सूची में अंकित किया।
बिहू असम
असमवसंत — रंगाली बिहू
असम के वसंत नववर्ष पर्व (रंगाली/बोहाग बिहू) का नृत्य — युवक-युवतियाँ ढोल,
भैंस-सींग की पेपा और झाँझ पर द्रुत कटि-भुजा गतियों से नाचते हैं। वेश सुनहरे
मूगा रेशम का; गीत प्रेम, यौवन और जागती धरती के। 2023 में गुवाहाटी की एक बहुचर्चित
विशाल सामूहिक बिहू प्रस्तुति ने गिनीज़ विश्व कीर्तिमान बनाया — पूरे असम में गर्व से
मनाया गया क्षण।
डोल्लु कुनिता कर्नाटक
कर्नाटकढोल-नृत्य
कर्नाटक का गरजता ढोल-नृत्य: नर्तक कमर पर टँगा बड़ा पीपे-सा डोल्लु लिये,
डंडों और हथेलियों से बजाते हुए वृत्तों, गुँथावों और कलाबाज़ संरचनाओं में घूमते हैं
— जो नृत्य चढ़ने के साथ द्रुत और सघन होती जाती हैं। परम्परा से कुरुबा समुदाय द्वारा
और बीरेश्वर (बीरलिंगेश्वर) की उपासना से जुड़ा, यह आज उत्सवों, शोभायात्राओं और मैसूरु
दशहरा की स्थायी उपस्थिति है — ध्वनि पूरे गाँव तक पहुँचती है।
कंसाले कर्नाटक
दक्षिण कर्नाटकअनुष्ठानिक — भक्तिमूलक
एम.एम. पहाड़ियों के देव मले महादेश्वर के उपासकों की भक्ति-कला: नर्तक देव की
महाकाव्य गाथाएँ गाते हुए कंसाले — काँसे की झाँझ-सरीखी दो तश्तरियाँ —
चमकती तालबद्ध आकृतियों में बजाते हैं, जो एक साथ नृत्य भी है, संगीत भी, उपासना भी।
परम्परा से वंशानुगत भक्ति-साधना के रूप में सीखी जाने वाली यह कला सादे बैठे भजन से
चक्करदार सामूहिक रचनाओं तक खिलती है, और अब राज्य-भर की लोक मंडलियों द्वारा भी
मंचित होती है।
वीरगासे कर्नाटक
कर्नाटकओजस्वी — शैव परम्परा
कर्नाटक की वीरशैव (लिंगायत) परम्परा का प्रचंड, ओजस्वी नृत्य — शिव के क्रोध से
जन्मे योद्धा वीरभद्र के रौद्र का अभिनय। वीरभद्र-वेश में, रँगी भौंहों और खड्गों के
साथ नर्तक गूँजते ढोलों पर दक्ष-यज्ञ की कथा उछलती, धमकती तीव्रता के आवेगों में कहते
हैं। दशहरा शोभायात्राओं और मंदिर-उत्सवों में — प्रायः डोल्लु कुनिता और कंसाले के
संग — प्रस्तुत होता है।
कोडगु (कूर्ग) के कोडवा नृत्य कर्नाटक
कोडगु, कर्नाटकसामुदायिक व पर्व नृत्य
कोडगु की पहाड़ियों का कोडवा समुदाय अपनी विशिष्ट नृत्य-धरोहर सँजोए है, जो
पुत्तरी (धान की फ़सल) और कैलपोध जैसे पर्वों पर जीवंत होती है:
दीपक के चारों ओर पारम्परिक वेश और छोटी झाँझों के साथ स्त्रियों का लालित्यमय
वृत्त-नृत्य उम्मथाट, और चँवरों के साथ पारम्परिक वादन पर पुरुषों के
आनुष्ठानिक नृत्य, जिनमें बोलक-आट प्रमुख है। कोडवा नृत्य, वेश और पर्व-संस्कृति
कर्नाटक की सबसे विशिष्ट लघु-परम्पराओं में है — घर और प्रवास, दोनों में सामुदायिक
संस्थाओं द्वारा गर्व से सहेजी हुई।
यक्षगान तटीय कर्नाटक — रंगमंच देखिए
कर्नाटकनृत्य-नाट्य
दहकती वेशभूषाओं और गगनचुम्बी मुकुटों वाला कर्नाटक का रात-भर चलने वाला महान
नृत्य-नाट्य रंगमंच एवं कथावाचन पृष्ठ पर
सविस्तार है — नृत्य-नाट्य होने के नाते यह वहीं बसता है जहाँ नृत्य, संगीत और अभिनय
मिलते हैं। पर कर्नाटक की नृत्य-धरोहर का कोई चित्र इसके बिना पूरा नहीं — इसे
मार्ग-संकेत समझिए।
रौफ़, कोली, करगाट्टम और विस्तृत मानचित्र भारत-भर
अखिल भारतचयन
लोक-मानचित्र अक्षय है: ईद और फ़सल पर कश्मीर का कोमल स्त्री पंक्ति-नृत्य
रौफ़; पतवार और लहरों की गतियों वाला महाराष्ट्र के मछुआरों का कोली
नृत्य; वर्षा-देवी मरिअम्मन के सम्मान में सजे जलकलश संतुलित करता तमिलनाडु का
करगाट्टम; तेलंगाना का पुनर्जीवित योद्धा-नृत्य पेरिणी शिवताण्डवम्;
और मध्य तथा पूर्वोत्तर भारत के सामूहिक डंडा-नृत्य व जनजातीय वृत्त-नृत्य। हर एक
अपने अध्ययन का अधिकारी है — यह पृष्ठ द्वार है, गणना नहीं।
सटीकता पर टिप्पणी: नृत्य-रूपों की उत्पत्ति-कथाओं में प्रलेखित इतिहास,
परम्परा और किंवदंती घुले-मिले हैं; जहाँ कोई प्रवर्तक या काल प्रमाणित नहीं, पारम्परिक
है (जैसे कुचिपुड़ी के लिए सिद्धेन्द्र योगी), वहाँ वैसा ही कहा गया है। कृपया विवरण
संगीत नाटक अकादमी और शोध-स्रोतों से सत्यापित करें। यह हिन्दी पृष्ठ एक प्रायोगिक
अनुवाद है — भाषा-सुझाव सादर आमंत्रित हैं।