संगीत एवं गायन परम्पराएँ

संगीत — राग अर्थात् भावना की नदी

भारतीय शास्त्रीय संगीत दो स्तम्भों पर टिका है: राग — स्वरों, वाक्यांशों और भाव का अपना अलग संसार, प्रायः दिन के किसी प्रहर या ऋतु से जुड़ा स्वर-ढाँचा — और ताल, लय का चक्र। इन्हीं साझा जड़ों से दो महान पद्धतियाँ विकसित हुईं: उत्तर का हिन्दुस्तानी संगीत और दक्षिण का कर्नाटक संगीत। इनके चारों ओर और नीचे भक्ति और लोकगीतों का महासागर बहता है।

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सप्त स्वरों के साथ तानपूरा
सीधे जाइए: हिन्दुस्तानी कर्नाटक संगीत ध्रुपद ख़याल ठुमरी ग़ज़ल भक्ति एवं लोक

दो शास्त्रीय पद्धतियाँ

एक ही प्राचीन मूल — नाट्यशास्त्र और 13वीं शताब्दी के संगीत रत्नाकर जैसे परवर्ती ग्रंथों में वर्णित — मध्यकालीन शताब्दियों में दो धाराओं में बँट गया।

हिन्दुस्तानी संगीत उत्तर भारत

उत्तर एवं मध्य भारत घराना पद्धति तात्कालिक सृजन-प्रधान

इतिहास

दिल्ली सल्तनत और मुग़ल दरबारों के अधीन उत्तर भारतीय संगीत ने फ़ारसी और मध्य एशियाई प्रभाव आत्मसात किए, और मध्यकाल में हिन्दुस्तानी संगीत ने अपना विशिष्ट रूप पाया। 13वीं–14वीं शताब्दी के कवि-संगीतकार अमीर ख़ुसरो इस संगम के अनेक नवाचारों से पारम्परिक रूप से जोड़े जाते हैं, और सम्राट अकबर के 16वीं शताब्दी के दरबार के किंवदंती-पुरुष गायक तानसेन वह आदि-स्रोत बने जिन तक अनेक परम्पराएँ अपना वंश जोड़ती हैं। घराना कहलाने वाली शैलीगत पाठशालाओं (ग्वालियर, आगरा, किराना, जयपुर-अतरौली, पटियाला आदि) ने परिवार और गुरु-शिष्य परम्पराओं के माध्यम से अलग-अलग मार्ग सुरक्षित रखे।

विवरण

प्रस्तुति में प्रायः एक ही राग विस्तार से खिलता है — तालमुक्त, ध्यानमग्न आलाप से लेकर तबले द्वारा सँभाली गई तालों में निबद्ध रचनाओं (बंदिश) तक — व्यापक तात्कालिक सृजन के साथ। तानपूरे का स्वर-आधार सब कुछ थामे रहता है। गायन ही वह आदर्श माना जाता है जिसका अनुसरण वाद्य करते हैं।

महत्त्व

विश्व की महान तात्कालिक-सृजन प्रधान कला-संगीत पद्धतियों में से एक; रविशंकर जैसी विभूतियों के माध्यम से इसने भारतीय संस्कृति की वैश्विक समझ को गहराई से गढ़ा।

विभूतियाँ: तानसेन (किंवदंती-पुरुष आदि-स्रोत), विष्णु नारायण भातखंडे और विष्णु दिगम्बर पलुस्कर (20वीं शताब्दी के व्यवस्थापक और शिक्षक), भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व, किशोरी अमोणकर, गंगूबाई हानगल, उस्ताद अमीर ख़ाँ, पंडित जसराज।

कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत

दक्षिण भारत रचना-प्रधान कच्चेरी प्रस्तुति-क्रम

इतिहास

दक्षिणी पद्धति ने प्राचीन भारतीय सिद्धान्त से अधिक सीधी निरन्तरता बनाए रखी और अपना कठोर ढाँचा विकसित किया — 17वीं शताब्दी में संहिताबद्ध 72 मेलकर्ता जनक-राग (विद्वान वेंकटमखि से सम्बद्ध)। इसका स्वर्णयुग आया रचनाकारों की "त्रिमूर्ति" के साथ — तीनों 18वीं शताब्दी में तमिलनाडु के तिरुवारूर में या उसके निकट जन्मे: त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री — जिनकी हज़ारों भक्ति-रचनाएँ इस संगीत-कोश का हृदय हैं। इनसे पहले पुरन्दर दास (जिन्हें प्रायः "कर्नाटक संगीत-शिक्षण के पितामह" कहा जाता है) और अन्नमाचार्य जैसे संत-रचनाकारों ने भक्ति और शिक्षण की नींव रखी।

विवरण

केन्द्र में है कृति — पल्लवि, अनुपल्लवि, चरणम् जैसे सुगठित खंडों वाली रचित भक्ति-रचना — जिसे राग आलापना, निरवल, कल्पनास्वर और कौशल की कसौटी रागम्-तानम्-पल्लवि जैसे तात्कालिक रूपों से सँवारा जाता है। कच्चेरियों में गायन या मुख्य वाद्य के साथ वायलिन, मृदंगम् और प्रायः घटम् या कंजीरा होते हैं। चेन्नई का दिसम्बर "मार्गऴि" संगीत-मौसम विश्व के सबसे बड़े शास्त्रीय संगीत-उत्सवों में गिना जाता है।

महत्त्व

एक ऐसी परम्परा जहाँ भक्ति, गणित और कौशल मिलते हैं; इसकी स-रि-ग-म स्वर-आधारित शिक्षण-पद्धति विश्व भर में संगीतकारों को प्रशिक्षित करती है।

विभूतियाँ: पुरन्दर दास, त्रिमूर्ति (त्यागराज, मुत्तुस्वामी दीक्षितर, श्यामा शास्त्री), एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी (भारत रत्न पाने वाली पहली संगीतकार), सेम्मंगुडी श्रीनिवास अय्यर, एम. बालमुरलीकृष्ण, डी. के. पट्टम्माल, एम. एल. वसन्तकुमारी; समकालीन स्वरों में टी. एम. कृष्णा और सुधा रघुनाथन।

प्रमुख हिन्दुस्तानी गायन-विधाएँ

विधाएँ आयु, गाम्भीर्य और भाव में भिन्न हैं — तपस्वी ध्रुपद से शृंगारमयी ठुमरी तक।

ध्रुपद जीवित सबसे प्राचीन शास्त्रीय गायन-शैली

तपस्वी एवं ध्यानमग्नपखावज संगत

संगीतशास्त्री ध्रुपद को हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन की जीवित प्रमुख शैलियों में सबसे प्राचीन मानते हैं; यह मंदिरों में और राजा मान सिंह तोमर के ग्वालियर (15वीं–16वीं शताब्दी) जैसे दरबारों में फला-फूला। "नोम-तोम" जैसे अक्षरों वाला दीर्घ, धीरे-धीरे खिलता आलाप गहरे पखावज की संगत वाली रचना में उतरता है। इसके सबसे प्रसिद्ध आधुनिक वाहक हैं डागर परिवार (जिनकी शैली डागरवाणी कहलाती है) और गुंडेचा बंधु, साथ ही दरभंगा (मल्लिक) परम्परा। ध्रुपद की ध्यानमग्न कठोरता ने विश्व भर में समर्पित श्रोता पाए हैं।

ख़याल आज की प्रमुख मंच-विधा

कल्पनाशील विस्तारतबला संगत

ख़याल (फ़ारसी-मूल प्रयोग में "कल्पना") 18वीं शताब्दी में प्रमुखता पर पहुँचा — मुहम्मद शाह "रंगीला" के मुग़ल दरबार के संगीतकार नियामत ख़ाँ "सदारंग" और अदारंग को पारम्परिक रूप से इसके गान-कोश को गढ़ने का श्रेय दिया जाता है। ध्रुपद से अधिक मुक्त और अलंकारमय ख़याल-प्रस्तुति में धीमी (बड़ा) और द्रुत (छोटा) रचनाओं की जोड़ी होती है, जिसे तानों (द्रुत स्वर-दौड़ों), बोल-तानों और सरगम से सँवारा जाता है। लगभग हर महान आधुनिक हिन्दुस्तानी गायक — भीमसेन जोशी, अमीर ख़ाँ, केसरबाई केरकर, किशोरी अमोणकर, रशीद ख़ाँ — मुख्यतः ख़याल गायक रहे हैं।

ठुमरी, टप्पा एवं तराना हल्की शास्त्रीय विधाएँ

शृंगार (प्रणय-भक्ति)शब्द-भाव प्रधान

ठुमरी, महान "उप-शास्त्रीय" विधा, 19वीं शताब्दी के लखनऊ (नवाब वाजिद अली शाह के दरबार से सम्बद्ध) और बनारस में खिली; इसके बोल — प्रायः ब्रजभाषा में कृष्ण-राधा का प्रणय — कोमल स्वर-मोड़ों के साथ शब्द-शब्द चखे जाते हैं। गिरिजा देवी, बेगम अख़्तर, सिद्धेश्वरी देवी और शोभा गुर्टू इसकी रानियों में थीं। चमकदार गुँथी हुई अलंकृतियों वाला टप्पा पारम्परिक रूप से शोरी मियाँ और पंजाब के ऊँट-सवारों के गीतों से जोड़ा जाता है। तराना लय-अक्षरों (त-न-देरे-ना) को उल्लासमय द्रुत प्रदर्शन में पिरोता है — पारम्परिक रूप से अमीर ख़ुसरो से सम्बद्ध।

ग़ज़ल गीत बनी उर्दू शायरी

काव्य-प्रधानभारत-फ़ारसी विरासत

ग़ज़ल एक काव्य-रूप है — प्रेम, विरह और दर्शन के तुकान्त शेर, जिन्हें मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा ग़ालिब जैसे शायरों ने उर्दू में पूर्णता दी — जो उपमहाद्वीप की सबसे प्रिय गीत-विधाओं में से एक बन गया। बेगम अख़्तर ने ग़ज़ल-गायकी को शास्त्रीय गरिमा दी; जगजीत सिंह इसे आधुनिक लोकप्रिय श्रोताओं तक ले गए, और मेहदी हसन तथा ग़ुलाम अली (पाकिस्तान से, भारत भर में आदृत) ने इसकी सुर-कला को गहराया। यह शास्त्रीय राग-अनुशासन और लोकप्रिय गीत के बीच सेतु है।

भक्ति एवं लोक गायन परम्पराएँ

जहाँ संगीत प्रार्थना है, प्रतिरोध है और रोज़ का जीवन भी।

भजन एवं कीर्तन अखिल भारत

अखिल भारतभक्ति आन्दोलन

मध्यकालीन भारत के भक्ति-आन्दोलनों ने कविता को सामूहिक गीत बना दिया। भजन — कबीर, मीराबाई, सूरदास और तुलसीदास जैसे संत-कवियों के भक्ति-गीत — घर के पूजाघर से संगीत-सभागारों तक गाए जाते हैं, जबकि कीर्तन दिव्य नामों का आह्वान-प्रतिवचन शैली का सामूहिक गायन है। सम्बद्ध क्षेत्रीय धाराओं में बंगाल और ओडिशा का वैष्णव कीर्तन तथा मणिपुर का संकीर्तन (यूनेस्को-अंकित, 2013) सम्मिलित हैं। एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी की भजन-रिकॉर्डिंगों और अनूप जलोटा की संगीत-सभाओं ने इस विधा को विराट श्रोता-समुदाय तक पहुँचाया।

क़व्वाली उत्तर भारत की सूफ़ी दरगाहें

उत्तर भारत — दरगाहेंसूफ़ी भक्ति

दक्षिण एशियाई सूफ़ी मत का उल्लासमय भक्ति-संगीत, जो पारम्परिक रूप से 13वीं–14वीं शताब्दी में अमीर ख़ुसरो और चिश्ती सिलसिले से जोड़ा जाता है। मुख्य गायक और समवेत स्वर, हारमोनियम तथा तालियों-ढोलक की धड़कती लय के साथ रहस्यवादी पंक्तियों को दोहराते और तीव्र करते हुए आध्यात्मिक तन्मयता की ओर ले जाते हैं। यह दिल्ली की निज़ामुद्दीन दरगाह और राजस्थान की अजमेर शरीफ़ जैसी दरगाहों में जीवित है; साबरी बंधुओं और सबसे बढ़कर नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ (पाकिस्तान) ने इसे विश्व-संगीत की परिघटना बना दिया।

बाउल बंगाल

पश्चिम बंगाल (और बांग्लादेश)यूनेस्को धरोहर (2008)

बाउल बंगाल के घुमन्तू रहस्यदर्शी गायक हैं, जिनके गीत — एक तार वाले एकतारा, डुग्गी और घुँघरुओं की संगत में — सिखाते हैं कि ईश्वर जाति और पंथ से परे, मानव देह में ही बसता है। लालन फ़क़ीर (19वीं शताब्दी) इनके शिखर कवि-संत हैं। बाउल गीतों को यूनेस्को ने अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (2008) के रूप में अंकित किया; इन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर को गहरे प्रभावित किया — अपने गीतों पर इनकी छाप ठाकुर ने स्वयं स्वीकारी है।

अभंग एवं वारकरी परम्परा महाराष्ट्र

महाराष्ट्रतीर्थयात्रा-गीत

अभंग पंढरपुर के विट्ठल (विठोबा) को समर्पित मराठी भक्ति-गीत हैं, जिन्हें वे वारकरी तीर्थयात्री गाते हैं जो प्रतिवर्ष पैदल उनके धाम जाते हैं। ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम (17वीं शताब्दी) जैसे संत-कवियों की ये रचनाएँ झाँझ (ताल) और मृदंग/पखावज की संगत में झूमती सामूहिक तन्मयता के साथ गाई जाती हैं। भीमसेन जोशी की अभंग-रिकॉर्डिंगें ("संतवाणी") महाराष्ट्र भर में प्रिय आधुनिक धरोहर हैं।

शबद कीर्तन पंजाब — सिख परम्परा

पंजाबराग में गुरबाणी

गुरु ग्रंथ साहिब के शबदों (शबद) का गायन — जिसके पद स्वयं निर्धारित रागों के अन्तर्गत संयोजित हैं; इस तरह सिख धर्मग्रंथ विश्व के महान राग-संयोजित गीत-संग्रहों में से एक है। यह गुरुद्वारों में प्रतिदिन होता है — सबसे प्रसिद्ध रूप से अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में — पारम्परिक रूप से हारमोनियम और तबले के साथ रबाब, ताऊस और दिलरुबा जैसे वाद्यों की संगत में; आज एक पुनर्जागरण-आन्दोलन पुराने तंत्री-वाद्यों को लौटा रहा है।

रवीन्द्र संगीत बंगाल

पश्चिम बंगालएक ही कवि की विधा

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के लगभग दो हज़ार गीत अपने आप में एक विधा हैं — शास्त्रीय रागों, बंगाली लोक (बाउल सहित) धुनों और प्रकृति, प्रेम व ईश्वर पर उनकी अपनी कविता का संगम। उनके दो गीत भारत ("जन गण मन") और बांग्लादेश ("आमार शोनार बांग्ला") के राष्ट्रगान बने। रवीन्द्र संगीत आज भी बंगाली जीवन का भावनात्मक पार्श्व-संगीत बना हुआ है।

कन्नड़ गीत-परम्पराएँ कर्नाटक

कर्नाटकभक्ति, दर्शन एवं लोक

कर्नाटक कन्नड़ में गीतों की एक अखण्ड नदी बहाता आया है। 12वीं शताब्दी के बसवण्णा, अक्का महादेवी और शरण कवियों के वचन — मुक्त-छन्द आध्यात्मिक उद्गार — आज भी गाए जाते हैं; हरिदास संतों (पुरन्दर दास, कनक दास) के देवरनामा स्वयं कर्नाटक संगीत-शिक्षण की आधारशिला बने; और शिशुनाल शरीफ़ जैसे रहस्यदर्शियों के तत्त्व पद गाँव के रूपकों में दर्शन ले चलते हैं। साथ-साथ लोकधाराएँ बहती हैं: उत्तर कर्नाटक की हाज़िरजवाब, तात्कालिक गीगी पद गीत-प्रतियोगिताएँ, सोबाने विवाह-गीत, और विशाल जनपद गीते (लोकगीत) कोश। 20वीं शताब्दी में भावगीते ("भाव-गीत") ने कुवेम्पु, बेन्द्रे आदि की आधुनिक कविता को धुनों में ढाला — पी. कालिंग राव ने इसका सूत्रपात किया, मैसूर अनन्तस्वामी और सी. अश्वत्थ ने इसे आगे बढ़ाया — और यह प्रिय विधा सुगम संगीत नाम से भी जानी जाती है।

सोपान संगीतम् एवं हवेली संगीत केरल एवं राजस्थान-ब्रज

केरल एवं नाथद्वारामंदिर-गायन

दो अनमोल मंदिर-गीत धाराएँ: केरल का सोपान संगीतम् गर्भगृह की सीढ़ियों (सोपानम्) पर बालू-घड़ी के आकार के एडक्का वाद्य की संगत में गाया जाता है — धीमी, गहरी अलंकृत शैली, जिसकी महान आधुनिक आवाज़ थे ञेरलत्तु राम पोडुवाल, और जिसका मुहावरा कथकली-संगीत और केरल के अष्टपदी-गायन को रँगता है। हवेली संगीत नाथद्वारा के श्रीनाथजी और ब्रज क्षेत्र के पुष्टिमार्ग मंदिरों (हवेलियों) का ध्रुपद-मूल भक्ति-गायन है — दिन के आठ दर्शनों में देवता को अर्पित ऋतु-राग और कीर्तन।

व्यापक लोक गीत-कोश भारत भर में

अखिल भारतचयन

हर क्षेत्र अपनी विधाएँ गाता है: कमायचा और सारंगी के साथ राजस्थान के मांगणियार और लंगा वंशानुगत संगीतकार; भोजपुरी विवाह और ऋतु-गीत; असम के बिहूगीत; कश्मीर का सूफ़ियाना और चकरी; बंगाल की नदियों के भटियाली नाव-गीत; तमिल लोरियाँ और मंदिर-गीत; महाराष्ट्र के पोवाडा वीर-गाथागीत। लोकधुनों ने सदा शास्त्रीय और फ़िल्म-परम्पराओं को सींचा है — और फ़िल्म-संगीत आज भारत का सबसे व्यापक रूप से सुना जाने वाला संगीत-रूप है।

सटीकता पर टिप्पणी: अमीर ख़ुसरो और तानसेन जैसे आरम्भिक व्यक्तित्वों को दिए जाने वाले श्रेय में इतिहास और किंवदंती घुले-मिले हैं; उन्हें यहाँ पारम्परिक मान्यताओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अनुमानित तिथियाँ और विवरण संगीत नाटक अकादमी तथा आईटीसी संगीत रिसर्च अकादमी जैसे संगीतशास्त्रीय स्रोतों से सत्यापित करें। सामग्री की अंतिम समीक्षा: जुलाई 2026 · देखें स्रोत एवं संदर्भ। यह हिन्दी पृष्ठ एक प्रायोगिक अनुवाद है — भाषा-सुझाव सादर आमंत्रित हैं।