कला कोश — संग्रहालय

कलाओं का ख़ज़ाना — वस्तुओं के माध्यम से कला की कथा

हर कला अपने पीछे वस्तुएँ छोड़ जाती है — घुँघरू और मुकुट, ढोल और मुखौटे, खिलौने और तार। यह वर्चुअल संग्रहालय उन्हें विभाग-दर-विभाग, क्षेत्रवार एकत्र करता है — हर वस्तु के साथ यह कथा कि वह क्या है, किससे बनी है, और किसके हाथों में जीवित होती है। एक छोटा संग्रह, जो निरंतर बढ़ता रहेगा।

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कैसे देखें: नीचे के चार विभागों में विचरण कीजिए — कर्नाटक, दक्षिण, उत्तर और पूर्व। किसी भी वस्तु के चित्र को छूने पर वह पूर्ण आकार में खुलता है। संग्रह बढ़ने के साथ नई वस्तुएँ जुड़ती रहेंगी।

विभाग १ — कर्नाटक

घर का विभाग — इस राज्य के मंच, देवालय और कार्यशालाओं की वस्तुएँ।

गदा लिए, स्वर्णिम किरीट धारण किए यक्षगान कलाकार

यक्षगान किरीट तटीय कर्नाटक

यक्षगान का गगनचुंबी मुकुट — तराशी लकड़ी, वस्त्र, स्वर्ण-लेप और शीशे के काम से बना। हर पात्र-वर्ग का अपना शिरोभूषण — मुकुट जितना भव्य, भूमिका उतनी महान। इसी वैभव को धारण किए कलाकार संध्या से भोर तक अभिनय करता है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
काँसे के कंसाले घुमाते नर्तक

कंसाले दक्षिणी कर्नाटक

काँसे की दो तश्तरियाँ — एक झाँझ, एक प्रहारक — जो एक साथ वाद्य, रंग-सामग्री और समर्पण हैं। मले महादेश्वर के भक्त देवता की गाथाएँ गाते हुए कंसाले को बिजली की तरह घुमाते हैं — क्रमशः विस्मयकारी कलाबाज़ियों तक।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
चन्नपटना की कार्यशाला में लकड़ी की गुड़ियों पर हाथ से रंग करता कारीगर

चन्नपटना के खिलौने चन्नपटना, कर्नाटक

बेंगलूरु–मैसूरु मार्ग के "खिलौना नगर" के लाख-चमक वाले काठ के खिलौने — ख़राद पर घुमाए, लाख के रंगों में रँगे, चमकने तक घिसे हुए। जीआई-मान्यता प्राप्त इस शिल्प में आज भी — जैसा इस चित्र में — हर चेहरा हाथ से ही रँगा जाता है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

विभाग २ — केरल और तमिलनाडु

जहाँ ढोल शोभायात्राओं का नेतृत्व करते हैं और श्रृंगार भी नियमबद्ध कला है।

याली की नक्काशी वाली सरस्वती वीणा

सरस्वती वीणा तमिलनाडु

कर्नाटक संगीत का भव्य तंत्री वाद्य — बड़ा तूँबा, सारिकाओं वाला दंड, गोद में टिकने वाला कद्दू, और सिरे पर तराशा याली। तंजावुर के वीणा-निर्माता विशेष प्रसिद्ध हैं; उत्तम वीणा कभी-कभी कटहल की लकड़ी के एक ही टुकड़े से तराशी जाती है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
रस्सियों से कसे चेंडा ढोल और मुड़ी छड़ियों के साथ वादक

चेंडा केरल

केरल का बेलनाकार ढोल — सीधा लटकाकर मुड़ी छड़ियों से बजाया जाता है। इसकी कड़क गूँज मंदिर-प्रांगणों के पार तक जाती है और कथकली के नाटक का नेतृत्व करती है; उत्सवों की सामूहिक चेंडा मंडलियाँ भारतीय संगीत की सबसे बुलंद ध्वनियों में हैं।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
हरे पच्चा श्रृंगार और सफ़ेद चुट्टी में कथकली कलाकार

कथकली पच्चा और चुट्टी केरल

मुकुट से पहले घंटों का श्रृंगार। हरा पच्चा मुख उदात्त नायक की पहचान है; ठुड्डी को घेरती सफ़ेद चुट्टी काग़ज़ और चावल के लेप की परतों से विशेषज्ञ कलाकार ही बनाते हैं। यह ऐसा मुखौटा है जो चल भी सकता है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
दीपालोकित मंदिरों के सम्मुख पूर्ण वेशभूषा में भरतनाट्यम नर्तकी

भरतनाट्यम वेशभूषा और मंदिर आभूषण तमिलनाडु

घुटनों के मुड़ते ही खुलने वाला चुन्नटों का पंखा, और देव-प्रतिमाओं के गहनों की प्रतिध्वनि करता "मंदिर आभूषण" सेट — सूर्य-चंद्र का शिरोभूषण, हार, कमरबंद और घुँघरू। यहाँ खजुराहो नृत्य महोत्सव के मंच पर — सीढ़ियों से नटराज निहार रहे हैं।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

विभाग ३ — उत्तर भारत

देवांगी की अपनी साधना का हिन्दुस्तानी संसार — घुँघरू, तार और ताल।

गति में कथक नर्तकी के पैरों पर बँधे घुँघरुओं का समीप दृश्य

घुँघरू उत्तर भारत

टख़नों पर बँधी पीतल की घंटियों की पंक्तियाँ — कथक नर्तकी के पैरों की वाणी। साधना जितनी गहरी होती है, घुँघरू उतने बढ़ते जाते हैं — प्रायः हर पैर पर सौ या अधिक तक। आदर के साथ बाँधे गए घुँघरू तत्कार के पदाघातों को संगीत बना देते हैं।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
तबला जोड़ी — लकड़ी का दायाँ और धातु का बायाँ

तबला उत्तर भारत

हिन्दुस्तानी लय का हृदय — दाएँ हाथ के लिए लकड़ी का दायाँ, बाएँ के लिए धातु का बायाँ। हर पूड़ी पर काली स्याही की टिकिया — परत-दर-परत लगाया गया लेप — ही वह रहस्य है जो तबले को बोलती, गाती आवाज़ देता है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
संग्रहालय में प्रदर्शित दो सितार

सितार उत्तर भारत

हिन्दुस्तानी तंत्री वाद्यों की सबसे पहचानी आवाज़ — गहरा तूँबा, लंबा खोखला दंड, हिलाए जा सकने वाले मुड़े परदे। तार पर आघात नहीं, खिंचाव होता है, इसलिए एक ही परदे से पूरा वाक्य निकल सकता है; मुख्य तारों के नीचे तरब के तार गूँज में उत्तर देते हैं। देवांगी जो वाद्य सीख रही हैं, वह यही है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
पाँच विभिन्न शैलियों की सारंगियों का संग्रहालय प्रदर्शन

सारंगी उत्तर भारत और राजस्थान

लकड़ी के एक ही टुकड़े से तराशी, गज़ से बजाई जाने वाली, दर्जनों तरब-तारों वाली सारंगी — मानव कंठ के सबसे निकट का वाद्य कही जाती है। यह प्रदर्शन-पेटिका दिखाती है कि क्षेत्र बदलते ही इसका रूप कैसे बदलता है — पाँच सारंगियाँ, पाँच लहजे।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
पगड़ी और गोटे-शीशे के घाघरों वाली राजस्थानी कठपुतलियाँ

कठपुतली राजस्थान

राजस्थान की डोर से नचाई जाने वाली पुतलियाँ — तराशे काठ के सिर, रँगे चेहरे, घूमते लंबे घाघरे। भाट समुदाय की पारंपरिक कला — जिनके घुमंतू खेल राजाओं और वीरों की गाथाएँ गाँव-गाँव पहुँचाते रहे।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

विभाग ४ — पूर्व और पूर्वोत्तर

रूप बदल देने वाले मुखौटे, नर्तकियों को मंदिर बना देने वाले घाघरे, और एक विनम्र तार।

विशाल अलंकृत मुकुट वाला उग्र पुरुलिया छऊ मुखौटा

छऊ मुखौटा पुरुलिया, पश्चिम बंगाल

पुरुलिया छऊ के महा-मुखौटे — नर्तक के कंधों से भी चौड़े फैलने वाले मनकों, पंखों और चमकी के प्रभामंडल। काग़ज़, कपड़े और मिट्टी की परतों से पारंपरिक मुखौटा-निर्माता परिवार इन्हें गढ़ते हैं; ये कलाबाज़ नर्तकों को देवता और असुर बना देते हैं — स्वयं एक जीआई-मान्यता प्राप्त शिल्प।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
पोटलोई घाघरों में नर्तकियों के साथ मणिपुरी रास लीला का मंच

पोटलोई मणिपुर

मणिपुरी रास लीला का कड़ा, ढोलनुमा घाघरा — ढाँचे पर कढ़ाई और शीशे-जड़ी परतें, जिनके ऊपर नर्तकी मानो तैरती दिखती है। परम्परा इसका रूपांकन 18वीं सदी के भक्त-राजा राजर्षि भाग्यचंद्र के दरबार से जोड़ती है — आज की रास लीला को गढ़ने वाले भी वही थे।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
एक तार वाला एकतारा वाद्य

एकतारा बंगाल और उससे आगे

एक तार, छोटा तूँबा, दो लचीली भुजाएँ — दबाइए तो स्वर झुक जाता है। एकतारा (बंगाल में प्रायः गोपीयंत्र) घुमक्कड़ बाउल गायकों का नित्य संगी है — प्रमाण कि संगीत का पूरा संसार एक ही तार पर टिक सकता है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स

विभाग ५ — पश्चिम भारत

वे उत्सव जो हाथों में थामे जा सकते हैं।

मंच पर डांडिया उठाए, रास की गोलाई में घूमती नर्तकियाँ

डांडिया गुजरात

ख़राद पर बनी, चटख रंगों में रँगी छड़ियों की जोड़ी — गुजरात का महान नवरात्रि उत्सव, दो हाथों में। साथी की छड़ियों से ताल में टकराती, गोल घूमते रास की रचनाओं में — नर्तक इस परम्परा को कृष्ण की रासलीला से जोड़ते हैं; आज यह संगीत-मंचों तक भी पहुँची है।

चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स
प्रदर्शित चित्रों के विषय में: चित्र विकिमीडिया कॉमन्स से लिए गए हैं — छायाकारों और लेखकों को सादर आभार; प्रत्येक चित्र के पूर्ण श्रेय-विवरण संकलित किए जा रहे हैं। संशोधनों के लिए संपर्क पृष्ठ अथवा namaste.rasabharat@gmail.com। यह हिन्दी पृष्ठ एक प्रायोगिक अनुवाद है — भाषा-सुझाव सादर आमंत्रित हैं।