आधारभूत शब्द
नाट्यशास्त्र
प्रदर्शन-कला पर प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ, जिसका श्रेय भरत मुनि को दिया जाता है (काल स्थूल रूप से लगभग 200 ई.पू. – 200 ई.)। भारतीय नृत्य, नाटक और संगीत की सैद्धान्तिक जड़।
रस
शाब्दिक अर्थ "रस" या "सार" — वह सौन्दर्यानुभूति जो कोई प्रस्तुति दर्शक के भीतर जगाती है। शास्त्रीय सिद्धान्त शृंगार (प्रेम) से शान्त (शान्ति) तक आठ (बाद में नौ) रसों के नाम गिनाता है। इस स्थल का नाम इसी पर रखा गया है। पूरा नवरस पृष्ठ पढ़िए →
भाव
वह अभिव्यक्ति-अवस्था या अनुभूति जिसे कलाकार आत्मसात करता है; कलाकार का भाव ही दर्शक में रस को जन्म देता है।
अभिनय
अभिव्यक्ति की कला — चेहरे, आँखों, मुद्रा और देह के माध्यम से अर्थ और भाव पहुँचाना। भरतनाट्यम, ओडिसी और कूडियाट्टम जैसे रूपों का हृदय।
मुद्रा / हस्त
निर्धारित अर्थों वाली संहिताबद्ध हस्त-मुद्राएँ — हिरण, कमल, राजा, प्रश्न। क्रम में जोड़ने पर ये नर्तक को पूरी कथाएँ "बोलने" की सामर्थ्य देती हैं।
नृत्त · नृत्य · नाट्य
शास्त्रीय त्रयी: नृत्त शुद्ध, अमूर्त नर्तन है (लय और आकृति); नृत्य अर्थ पहुँचाने वाला भावपूर्ण नर्तन; नाट्य पात्रों और कथा वाला पूर्ण नाटक।
गुरु–शिष्य परम्परा
गुरु से शिष्य तक चलने वाली वह वंशधारा जिससे शास्त्रीय कलाएँ सदियों से हस्तान्तरित होती आई हैं — प्रायः गुरु के साथ रहकर या उनकी निकट सेवा करते हुए, प्रदर्शन, संशोधन और समर्पण से सीखते हुए।
घराना
शाब्दिक अर्थ "घर" — हिन्दुस्तानी संगीत और कथक की शैलीगत वंशधारा या पाठशाला, जिसमें हर घराने का अपना भंडार, तकनीक और सौन्दर्यबोध होता है और जो परिवार या गुरु-शिष्य परम्परा से आगे बढ़ता है। उदाहरण: कथक में लखनऊ, जयपुर और बनारस घराने; गायन में ग्वालियर, किराना, पटियाला और जयपुर-अतरौली।
लास्य और तांडव
नृत्य-ऊर्जा के दो ध्रुव: लास्य, लालित्यपूर्ण, गीतात्मक, परम्परा से स्त्रैण शैली (मोहिनीअट्टम का केन्द्र); तांडव, शिव के ब्रह्मांडीय नृत्य से जुड़ी ओजस्वी, शक्तिशाली शैली।
नृत्य-नाटिका
वह रूप जिसमें नृत्य, संगीत, वेशभूषा और अभिनय मिलकर पूरी कथाएँ मंच पर उतारते हैं — कथकली, यक्षगान, कुचिपुड़ी का पुराना भंडार, सत्रिया का अंकीया नाट।
नृत्य के शब्द
अडवु
भरतनाट्यम की मूलभूत लयबद्ध पद-संचालन और भंगिमा की इकाइयाँ — वह "वर्णमाला" जिसे जोड़कर लम्बे क्रम बनते हैं।
अरैमंडी
घुटनों को बाहर की ओर मोड़कर आधा बैठने की मुद्रा — भरतनाट्यम की आधारभूत स्थिति।
तत्कार
कथक का लयबद्ध पद-संचालन, जो घुंघरुओं के साथ सपाट पाँव से किया जाता है — असाधारण गति और तबले के साथ गणितीय क्रीड़ा में सक्षम।
चक्कर
कथक की घूर्णियाँ — तेज़ चक्कर, कभी-कभी एक क्रम में दर्जनों — जो ठीक सम पर समाप्त होती हैं।
त्रिभंगी और चौक
ओडिसी की दो पहचान-मुद्राएँ: त्रिभंगी, तीन मोड़ों (सिर, धड़, कटि) की लहरदार भंगिमा; चौक, भगवान जगन्नाथ से जुड़ी चौड़ी वर्गाकार स्थिति।
घुंघरू
नर्तकों द्वारा पहने जाने वाले पैरों के घुंघरू — कथक में प्रति पाँव सौ या उससे अधिक — जो पद-संचालन को सुनाई देने वाले संगीत में बदल देते हैं। पहले घुंघरू पाना एक संस्कार माना जाता है।
देवदासी और गोटिपुआ
ऐतिहासिक मन्दिर-कलाकार परम्पराएँ: देवदासियाँ, मन्दिर-सेवा को समर्पित स्त्रियाँ जिन्होंने भरतनाट्यम के पूर्वरूप को सँभाला; गोटिपुआ, स्त्री-वेश में नाचने वाले ओडिशा के बालक — ओडिसी तक पहुँचने वाला जीवित सेतु।
मार्गम
"पथ" — भरतनाट्यम की प्रस्तुति में रचनाओं का पारम्परिक क्रम: मंगलाचरण-रूपी अलारिप्पु से विस्तृत वर्णम होते हुए दमकते तिल्लाना तक।
संगीत के शब्द
राग
भारतीय संगीत का स्वर-ढाँचा — विशिष्ट वाक्यांशों, अलंकारों और भाव वाला स्वरों का निर्धारित समूह, जो प्रायः दिन के किसी प्रहर या ऋतु से जुड़ा होता है। न कोई स्केल, न कोई धुन: एक स्वर-व्यक्तित्व।
ताल
लय-चक्र — मात्राओं का दोहराता क्रम (तीनताल में 16, आदि ताल में 8) — जिसके भीतर रचना और उपज (आशु-सृजन) खिलती हैं।
हिन्दुस्तानी संगीत
उत्तर भारत की शास्त्रीय पद्धति — फ़ारसी–मध्य एशियाई सम्पर्क से गढ़ी हुई, घरानों में संगठित और उपज (आशु-सृजन) पर केन्द्रित। पूरा विवरण पढ़िए →
कर्नाटक संगीत
दक्षिण भारत की शास्त्रीय पद्धति — रचित भक्ति-कृतियों और 72 मेलकर्ता स्केल-पद्धति पर केन्द्रित। पूरा विवरण पढ़िए →
आलाप
राग-प्रस्तुति का तालरहित, ध्यानमग्न आरम्भ — बिना लय के, स्वर-दर-स्वर, धीरे-धीरे राग का उन्मीलन।
बंदिश और कृति
रचित रचनाएँ: बंदिश हिन्दुस्तानी संगीत की राग और ताल के भीतर बँधी निर्धारित रचना है; कृति कर्नाटक संगीत की भक्ति-रचना, जो प्रायः तीन खण्डों (पल्लवि, अनुपल्लवि, चरणम्) में होती है।
कच्चेरी
कर्नाटक संगीत की सभा-प्रस्तुति का प्रारूप — प्रायः गायन या कोई स्वर-वाद्य, साथ में वायलिन, मृदंगम् और अन्य ताल-वाद्य; रचित कृतियों के साथ उपज का मेल, जिसका शिखर होता है ताल-वाद्यों का संवाद (तनि आवर्तनम्)।
मेलकर्ता
कर्नाटक संगीत की 72 "जनक" स्केलों की पद्धति जिनसे राग व्युत्पन्न होते हैं — स्वर-सम्भावनाओं का पूर्ण गणितीय मानचित्र, 17वीं सदी में संहिताबद्ध।
स्वर और सरगम
सात स्वर — सा, रि/रे, ग, म, प, ध, नि — और स्वरों के नाम लेकर धुनें गाने का अभ्यास: भारतीय संगीत का प्राचीन सॉल्फ़ेज।
गमक और मींड
अलंकरण — वे कम्पन, सरकाव और सज्जाएँ जो भारतीय स्वर-रचना को उसका घुमावदार, कंठ-सहज गुण देती हैं। मींड एक स्वर से दूसरे तक की चिकनी फिसलन है।
तान
हिन्दुस्तानी गायन और वादन की द्रुत स्वर-दौड़ें — राग के भीतर उपजाई जाने वाली कौशलपूर्ण झरनियाँ।
बोल और सोलकट्टु
भारतीय अवनद्ध-वादन के उच्चरित अक्षर (धा, धिन, ता, क…) — हर आघात का एक नाम है, इसलिए लय को बजाने से पहले बोला जा सकता है। दक्षिण की इस पद्धति को सोलकट्टु कहते हैं।
शिल्प एवं चित्रकला के शब्द
ज़री
धातु का तार — परम्परा से चाँदी या सोने में लिपटा रेशम — जो बनारसी रेशम जैसे किमख़ाबों में बुना जाता है या ज़रदोज़ी कढ़ाई में काढ़ा जाता है।
इकत
वह तकनीक जिसमें बुनाई से पहले ही सूत पर आकृति रँग दी जाती है; दोहरी इकत (जैसे पाटन की पटोला) ताने और बाने दोनों को रँगती है, जिससे आकृति करघे पर एकदम मिली-जुली उभरती है।
प्रतिरोध रँगाई (रेज़िस्ट डाइंग)
कोई भी तकनीक जो कपड़े के कुछ हिस्सों तक रंग पहुँचने से रोककर आकृतियाँ बनाती है — गाँठ बाँधना (बांधनी), मोम या मिट्टी (दाबू, बाटिक), या सिली हुई चुन्नटें। भारत की प्रतिरोध-रँगाई परम्पराएँ संसार की प्राचीनतम परम्पराओं में हैं।
गेसो कार्य
पलस्तर-जैसे लेप से बना उभरा हुआ अलंकरण, जिस पर बाद में सोना चढ़ाया जाता है — तंजावुर चित्रकला के उभरे स्वर्ण-आभूषणों के पीछे की तकनीक।
मोम-गलन ढलाई (सिर पेर्द्यु)
धातु-ढलाई की वह विधि जिसमें मोम के प्रतिरूप को मिट्टी में मढ़कर पिघला दिया जाता है, जिससे पिघली धातु के लिए साँचा बच जाता है — ढोकरा काँसों और मोहनजो-दड़ो की "नर्तकी" के पीछे की प्राचीन तकनीक।
प्राकृतिक वर्ण और रंग
खनिजों और वनस्पतियों से प्राप्त रंग — नील का नीला, मजीठ का लाल, हल्दी का पीला, दीये का काजल — अजन्ता के भित्तिचित्रों से कलमकारी और पट्टचित्र तक की परम्पराओं में प्रयुक्त।
मान्यता एवं स्थिति के शब्द
यूनेस्को ICH
यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूचियाँ — स्मारकों की नहीं, जीवित परम्पराओं की वैश्विक मान्यता। भारतीय प्रविष्टियों में कूडियाट्टम, रामलीला, वैदिक पाठ, कालबेलिया, छऊ, संकीर्तन, योग, दुर्गा पूजा और गरबा शामिल हैं। प्रविष्टि संरक्षण में सहायक होती है, पर परम्परा उसके समुदाय के ही हाथों में रहती है।
जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक)
भारत में पंजीकृत एक क़ानूनी संरक्षण जो किसी उत्पाद के नाम को उसके मूल क्षेत्र और पारम्परिक विधि से बाँधता है — जैसे बनारसी किमख़ाब, तंजावुर चित्र, कश्मीर पश्मीना या चन्नपटना खिलौने। यह असली शिल्पी समुदायों को नक़लों से बचाने में मदद करता है।
राष्ट्रीय अकादमियाँ
1950 के दशक में स्थापित भारत की राष्ट्रीय कला-अकादमियाँ: संगीत नाटक अकादमी (संगीत, नृत्य, नाटक), ललित कला अकादमी (दृश्य कलाएँ) और साहित्य अकादमी (साहित्य) — इस स्थल की परम्पराओं के लिए मान्यता, अध्येतावृत्तियाँ और अभिलेखागार।
भारत रत्न और पद्म पुरस्कार
भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान — भारत रत्न, उसके बाद पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्म श्री — विभूतियाँ पृष्ठ के अनेक कलाकारों को प्रदान किए गए हैं।