एक सहस्राब्दी से भी अधिक समय तक भारत की कथाएँ, लिपियाँ, देवता और नृत्य बाहर
की ओर यात्रा करते रहे — मानसूनी जहाज़ों से दक्षिण-पूर्व एशिया तक, रेशम मार्ग से
चीन-जापान तक, और तीन महासागर पार करते गिरमिटिया मज़दूरों की स्मृतियों में।
यह पृष्ठ उन्हीं यात्राओं का पीछा करता है — उन देशों तक, जहाँ भारत की कलाएँ
स्मृति नहीं, आज भी जीवित साधना हैं।
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मानसून की दुनिया — दक्षिण-पूर्व एशिया
जहाँ रामायण राष्ट्रीय महाकाव्य बनी — एक नहीं, कई बार।
मानसूनी व्यापार का जहाज़ — 9वीं सदी में जावा के बोरोबुदुर में उकेरा गया। ऐसे ही जहाज़ भारत की कथाएँ, लिपियाँ और देवता सागर पार ले गए। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
रामकियेन और खोन थाईलैंड
थाईलैंडमुखौटा नृत्य-नाटकजीवित राजपरम्परा
थाईलैंड का राष्ट्रीय महाकाव्य रामकियेन — थाई नामों, दृश्यों
और दरबारी शैली में कही गई रामायण ही है। वहाँ के राजा आज भी राम
की उपाधि धारण करते हैं, और पुरानी राजधानी अयुत्थया का नाम
अयोध्या से आया है। मंच पर यह महाकाव्य खोन बनकर जीता है —
नियमबद्ध मुद्राओं, दमकते मुकुटों और गायक-वृन्द वाला मुखौटा नृत्य-नाटक;
यूनेस्को से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय निधि।
खोन मुखौटा — थाई रंगमंच में रंग, मुकुट और भाव ही बताते हैं कि पात्र कौन है। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)दाढ़ों वाला हरा खोन मुखौटा — रंगों की यह संकेत-भाषा दर्शक को एक नज़र में नायक, राक्षस या वानर पहचनवा देती है। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
रीमकेर और अप्सरा नृत्य कम्बोडिया
कम्बोडियाशास्त्रीय नृत्य-नाटक
पृथ्वी का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक अंकोरवाट 12वीं सदी में
विष्णु के मंदिर के रूप में बना। इसकी दीवारों पर संसार की
महानतम उत्कीर्ण रामायणों में से एक है; और कम्बोडिया की अपनी कथा
रीमकेर को रॉयल बैले धीमी, मुड़ती अप्सरा शैली में नाचता है —
वही भंगिमाएँ, जो मंदिर की दीवारों पर दिव्य नर्तकियों की हैं। देश के सबसे
अँधेरे वर्षों में भी यह परम्परा बची — गुरुओं ने इसे स्मृति से फिर खड़ा किया।
महासर्प थामे देवता — समुद्र मंथन, अंकोरवाट की दीवार पर। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)कम्बोडिया का रॉयल बैले — स्मृति से पुनर्जीवित नृत्य। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)अप्सरा शैली — मंदिर की दीवारों की दिव्य नर्तकियों को प्रतिबिम्बित करती भंगिमाएँ। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
वायांग कुलित और प्रम्बानन बैले इंडोनेशिया
जावा और बाली, इंडोनेशियाछाया कठपुतली · नृत्य-नाटक
संसार के सबसे बड़े मुस्लिम-बहुल देश में रात-भर चलने वाला छाया रंगमंच
वायांग कुलित आज भी महाभारत और
रामायण ही खेलता है — कर्नाटक के तोगलु गोम्बेयाट का
चकित कर देने वाला बन्धु। जावा के 9वीं सदी के प्रम्बानन मंदिर के सामने
रामायण बैले आलोकित शिखरों की पृष्ठभूमि में होता है; और हिन्दू
बाली में केचक — जहाँ सौ बैठे कंठ ही वाद्यवृन्द
हैं — हनुमान का लंका-दहन खेलता है। बहासा ("भाषा") शब्द स्वयं संस्कृत
का भाषा है।
परदे के पास दलांग (सूत्रधार) — रात-भर चलता वायांग कुलित, सूत्रधार की ओर से। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)रामायण बैले — जावा के मंच पर राम की सेना लंका के राक्षसों से भिड़ती है। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
बाली के उलुवाटु तट-मंदिर में केचक — सौ बैठे कंठ ही वाद्यवृन्द हैं। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)दर्शकों के बीच से हनुमान का आगमन — बाली की रामायण-प्रस्तुतियों में वानर-देव दर्शकों के बीच ही चलते हैं। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)सीता और राक्षस — भारत के बच्चों को ज्ञात कथा का हर मोड़ जावा की कथा में सुरक्षित है। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
शेष रामायणें म्यांमार · लाओस · मलेशिया
मुख्यभूमि दक्षिण-पूर्व एशियानृत्य-नाटक · कठपुतली
म्यांमार यामा ज़ात्दॉ नाचता है; लाओस
फ्रा लक फ्रा राम सुनाता है; मलेशिया की बाटू गुफाओं का महान
थाईपूसम उत्सव भारतीय सूत्रों को वर्तमान तक लाता है। पूरे क्षेत्र
की लिपियाँ ही भारत की संतान हैं: थाई, ख्मेर, बर्मी, लाओ, जावानी और बाली अक्षर
दक्षिण भारत की पल्लव लिपि से होकर ब्राह्मी तक पहुँचते हैं —
लिखा गया हर शब्द एक मौन विरासत।
म्यांमार का योके थे सूत्रधार — वही राजसी कठपुतली रंगमंच जिसने यामा ज़ात्दॉ खेला। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)विश्राम में कठपुतलियाँ — बर्मी मंच के लिए तराशी, स्वर्णमंडित, डोर बँधीं। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)बर्मी शास्त्रीय नर्तक — यामा ज़ात्दॉ को धारण करने वाली दरबारी शैली। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
मोड़दार पोथी — ब्राह्मी से अक्षर-दर-अक्षर उतरी लिपि के ऊपर दिव्य आकृतियाँ। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)एक और पन्ना — महल, वन और हिरन, भारत-मूल की बहती लिपि के पास चित्रित। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
मलेशिया की बाटू गुफाओं की इंद्रधनुषी सीढ़ियाँ — जहाँ थाईपूसम में दस लाख से अधिक श्रद्धालु जुटते हैं। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
बौद्ध राजमार्ग — मध्य एशिया से जापान तक
भारत की कला एक सहस्राब्दी तक रेशम मार्ग पर चलती रही।
गुफा भित्तिचित्र और थांका चीन · तिब्बत
रेशम मार्ग · हिमालयचित्रकला
चीन की दुनहुआंग चित्रित गुफाएँ उस भित्तिचित्र-परम्परा की
कड़ी हैं जो मध्य एशिया से होकर अजंता तक लौटती है; और तिब्बत
की थांका चित्रकला नालन्दा के विहारों से उत्तर
ले जाया गया प्रतिमा-व्याकरण सँजोए है। परम्परा यह भी कहती है कि दक्षिण भारत
के भिक्षु बोधिधर्म चान (ज़ेन) का बीज — और किंवदंती के अनुसार
शाओलिन कलाएँ — साथ ले गए।
दुनहुआंग की मोगाओ गुफाओं का भित्तिचित्र — अजंता की ओर लौटती परम्परा। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)दुनहुआंग की उड़ती दिव्य आकृति (फेइतियन) — भारतीय गुफा-कला की उड़ती अप्सराओं की बहन। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
दुनहुआंग शैली में उपदेश देते बुद्ध — मध्य एशियाई वेश में भारतीय प्रतिमा-विधान। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)संस्कृत बौद्ध पांडुलिपि — ऐसे ग्रंथ हज़ार वर्ष रेशम मार्ग पर यात्रा करते रहे। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)हिमालयी पवित्र चित्र — भारत के विहारों से उत्तर पहुँचा प्रतिमा-व्याकरण। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
जापान में सरस्वती जापान
जापानजीवित मंदिर परम्परा
आज जापान के कुछ मंदिरों में जापानी नामों वाले भारतीय देवता मिलते हैं:
बेंज़ाइतेन ही सरस्वती हैं — वीणा के स्थान पर
बिवा लिए; बिशामोन्तेन वैश्रवण-कुबेर के वंशज हैं।
शिंगोन बौद्ध पंथ के कुछ मंदिर प्राचीन सिद्धं लिपि के संस्कृत
अक्षर एक सहस्राब्दी से श्रद्धापूर्वक लिखते आ रहे हैं — भारत के दैनिक व्यवहार
से लुप्त होने के बाद भी जापान में जीवित संस्कृत सुलेख।
19वीं सदी के जापानी काष्ठ-छाप चित्र में बिवा लिए बेंज़ाइतेन — घर से पाँच हज़ार किलोमीटर दूर सरस्वती। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)बेंज़ाइतेन का शिला-मंदिर (पट्ट पर 弁財天) — संगीत की देवी को आज भी फूल-दीप अर्पित। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)मुद्रित बौद्ध धारणी — पूर्व एशिया की भक्ति में सुरक्षित सिद्धं लिपि के संस्कृत अक्षर। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
तीन महासागरों के पार — गिरमिटिया संसार
गिरमिटिया मज़दूर जो स्मृति में ले गए, उनके वंशज आज भी मंच पर जीते हैं।
कैरेबियन में रामलीला त्रिनिदाद · गयाना · सूरीनाम
कैरेबियनखुले मैदान का सामुदायिक रंगमंच150+ वर्ष अखण्ड
1840 के दशक से जहाज़ — अधिकतर भोजपुरी अंचल के — गिरमिटिया मज़दूरों को
चीनी के उपनिवेशों तक ले गए। वे रामायण स्मृति में लेकर गए; और
त्रिनिदाद, गयाना, सूरीनाम में उनके वंशज तब से अब तक खुले मैदान
की रामलीला करते आ रहे हैं — पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों जैसी
ही, गाँव के लोग ही पात्र। नोबेल-पुरस्कृत कवि डेरेक वॉलकॉट ने
अपना 1992 का नोबेल व्याख्यान त्रिनिदाद के फेलिसिटी की रामलीला से ही आरम्भ
किया था। उनका संगीत चटनी भोजपुरी लोकगीत से बढ़कर कैरेबियन
की अपनी विधा बन गया है।
भारत में दशहरे की प्रतीक्षा करते रामलीला के विशाल पुतले — वही मातृ-परम्परा जिसे गिरमिटिया सागर पार ले गए। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)न्यूयॉर्क के इंडो-कैरेबियन समुदाय के फगवा (होली) ढोलवादक — भोजपुर से पाँच पीढ़ी दूर, भोजपुरी ढोल। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
फ़िजी, मॉरीशस और आगे हिंद महासागर · प्रशांत · अफ़्रीका
फ़िजी · मॉरीशस · दक्षिण अफ़्रीका · रेयूनियोंजीवित सामुदायिक परम्पराएँ
उन्हीं गिरमिट-युग की यात्राओं ने फ़िजी, मॉरीशस
(जहाँ भोजपुरी आज भी बोली-गाई जाती है), दक्षिण अफ़्रीका और
रेयूनियों में स्थायी परम्पराएँ रोपीं — रामायण पाठ मंडलियाँ,
मंदिर उत्सव, शास्त्रीय नृत्य विद्यालय। आज का वैश्विक प्रवासी समुदाय एक नई
परत जोड़ता है: न्यू जर्सी में भरतनाट्यम, लंदन में कथक, सिंगापुर में कर्नाटक
संगीत — पृथ्वी का चक्कर लगा चुका गुरु-शिष्य सूत्र, आज भी अटूट।
एक खुला प्रश्न — रोमा सूत्र
जहाँ विद्वान अब भी विमर्श में हैं, वहाँ हम यही कहते हैं।
सिंधु से अंदलूसिया तक? यूरोप
यूरोपप्रमाणित प्रवास · विमर्शाधीन कला-सम्बन्ध
यूरोप के रोमा लोग लगभग एक सहस्राब्दी पहले उत्तर-पश्चिम भारत
से निकले — इतना सुस्थापित है: उनकी भाषा हिन्दी-पंजाबी की बन्धु,
भारतीय-आर्य है। कुछ विद्वान आगे बढ़कर
फ्लेमेंको के ताल-चक्रों, पदाघातों और हस्त-मुद्राओं में रोमा
मार्ग से आई भारतीय विरासत सुनते हैं; अन्य फ्लेमेंको को अनेक स्रोतों का
इबेरियाई संगम मानते हैं। प्रवास तथ्य है; संगीत की वंशावली जीवित शास्त्रीय
विमर्श — हम इसे उत्तर नहीं, एक रोचक प्रश्न के रूप में ही रखते हैं।
19वीं सदी के उत्कीर्ण चित्र में रोमा संगीतकार — वह जन-समुदाय जिसकी भाषा हज़ार वर्ष पहले भारत से निकली। चित्र: विकिमीडिया कॉमन्स · और (English)
इस पृष्ठ के विषय में: ऊपर के इतिहास हज़ार वर्षों के आदान-प्रदान
को संक्षेप में कहते हैं; यात्रा करने वाली हर परम्परा अपने नए घर में बदली —
ये कलाएँ आज उन्हीं राष्ट्रों की हैं जो इन्हें जीते हैं, भारतीय नातेदारी की स्मृति
सहित। चित्र विकिमीडिया
कॉमन्स से, छायाकारों के सादर आभार सहित; हर शीर्षक आगे पढ़ने की कड़ी देता है।
सुझाव-संशोधन हेतु संपर्क पृष्ठ अथवा
namaste.rasabharat@gmail.com।
यह हिन्दी पृष्ठ एक प्रायोगिक अनुवाद है — भाषा-सुझाव
सादर आमंत्रित हैं।